भावनाओं की शून्यता
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वर्णमाला में स्त्रियाँ, स्वरों के समान होती हैं;
जिनके बिना शब्द रूपी कुटुंब अधूरे होते हैं।
शब्दों का यह अधूरापन वाक्य रूपी समाज में
एक चिरगामी रिक्तता का आविर्भाव कराता है।
यह रिक्तता व्यक्तिगत नैतिकता को जीर्ण करती है
और समाज को शून्यता के दुश्चक्र में झोंक देती है॥
एक भटके हुए समाज में नैतिक मूल्यों का कोई अर्थ नहीं होता
मानो, मानवीय संवेदनाओं की तिलांजलि दे दी गई हो
भावनाओं की यह शून्यता मानव समुदाय में
वैचारिक निकृष्टता के रूप में परिलक्षित होती है,
जो सर्वथा विनाश का पर्याय होती है॥
…“निश्छल”
©अमित “निश्छल”



